RAHIM KE DOHE

RAHIM KE DOHE – रहीम के दोहे

रहीम दास

जेहि ‘रहीम’ मन आपनो कीन्हो चारु चकोर।
निसि-वासर लाग्यो रहे, कृष्ण चन्द्र की ओर |

रहीम दास

‘रहिमन’ कोऊ का करै, ज्वारी,चोर,लबार।
जो पत-राखनहार है, माखन-चाखनहार |

रहीम दास

‘रहिमन’ गली है सांकरी, दूजो नहिं ठहराहिं।
आपु अहै, तो हरि नहीं, हरि, तो आपुन नाहिं

रहीम दास

अमरबेलि बिनु मूल की, प्रतिपालत है ताहि।
‘रहिमन’ ऐसे प्रभुहि तजि, खोजत फिरिए काहि

रहीम दास

जाल परे जल जात बहि, तजि मीनन को मोह।
‘रहिमन’ मछरी नीर को तऊ न छाँड़ति छोह

रहीम दास

धनि ‘रहीम’ गति मीन की, जल बिछुरत जिय जाय।
जियत कंज तजि अनत बसि, कहा भौर को भाय

रहीम दास

प्रीतम छबि नैनन बसी, पर-छबि कहां समाय।
भरी सराय ‘रहीम’ लखि, पथिक आप फिर जाय

रहीम दास

‘रहिमन’ पैड़ा प्रेम को, निपट सिलसिली गैल।
बिलछत पांव पिपीलिको, लोग लदावत बैल

रहीम दास

‘रहिमन’ धागा प्रेम को, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना मिले, मिले गांठ पड़ जाय

रहीम दास

‘रहिमन’ प्रीति सराहिये, मिले होत रंग दून।
ज्यों जरदी हरदी तजै, तजै सफेदी चून

रहीम दास

कहा करौं वैकुण्ठ लै, कल्पबृच्छ की छांह।
‘रहिमन’ ढाक सुहावनो, जो गल पीतम-बाँह

रहीम दास

जे सुलगे ते बुझ गए, बुझे ते सुलगे नाहिं।
‘रहिमन’ दाहे प्रेम के, बुझि-बुझिकैं सुलगाहिं

रहीम दास

टूटे सुजन मनाइए, जो टूटे सौ बार।
‘रहिमन’ फिर-फिर पोइए, टूटे मुक्ताहार

रहीम दास

यह न ‘रहीम’ सराहिये, देन-लेन की प्रीति।
प्रानन बाजी राखिये, हार होय कै जीत

रहीम दास

‘रहिमन’ मैन-तुरंग चढ़ि, चलिबो पावक माहिं।
प्रेम-पंथ ऐसो कठिन, सब कोउ निबहत नाहिं

रहीम दास

वहै प्रीत नहिं रीति वह, नहीं पाछिलो हेत।
घटत-घटत ‘रहिमन’ घटै, ज्यों कर लीन्हे रेत

रहीम दास

गहि सरनागति राम की, भवसागर की नाव।
‘रहिमन’ जगत-उधार को, और न कछू उपाय

रहीम दास

मुनि-नारी पाषान ही, कपि,पशु,गुह मातंग।
तीनों तारे रामजू, तीनों मेरे अंग

रहीम दास

राम-नाम जान्यो नहीं, जान्यो सदा उपाधि।
कहि ‘रहिम’ तिहि आपुनो, जनम गंवायो बाधि |

रहीम दास

मथत-मथत माखन रहे, दही मही बिलगाय।
‘रहिमन’ सोई मीत है, भीर परे ठहराय

रहीम दास

जिहि ‘रहीम’ तन मन लियो, कियो हिए बिच भौन।
तासों दु:ख-सुख कहन की, रही बात अब कौन

रहीम दास

जे गरीब सों हित करें, धनि ‘रहीम’ ते लोग।
कहा सुदामा बापुरो, कृष्ण-मिताई-जोग

रहीम दास

जो ‘रहीम’ करबौ हुतो, ब्रज को इहै हवाल।
तो काहे कर पर धर््यौ, गोवर्धन गोपाल

रहीम दास

हरि’रहीम’ ऐसी करी, ज्यों कमान सर पूर।
खेंचि आपनी ओर को, डारि दियौ पुनि दूर

रहीम दास

‘रहिमन’ कीन्ही प्रीति, साहब को भावै नहीं।
जिनके अगनित मीत, हमें गरीबन को गनैं |

रहीम दास

बिन्दु में सिन्धु समान, को अचरज कासों कहैं।
हेरनहार हिरान, ‘रहिमन’ आपुनि आपमें |

रहीम दास

सदा नगारा कूच का, बाजत आठौं जाम।
‘रहिमन’ या जग आइकै, को करि रहा मुकाम

रहीम दास

‘रहिमन’ बात अगम्य की, कहनि-सुननि की नाहिं।
जे जानत ते कहत नहिं, कहत ते जानत नाहिं

रहीम दास

‘रहिमन’ कठिन चितान तै, चिंता को चित चैत।
चिता दहति निर्जीव को, चिन्ता जीव-समेत

रहीम दास

सौदा करौ सो कहि चलो, ‘रहिमन’ याही घाट।
फिर सौदा पैहो नहीं, दूरि जात है बाट

रहीम दास

तै ‘रहीम’ अब कौन है, एतो खैंचत बाय।
जस कागद को पूतरा, नमी माहिं घुल जाय

रहीम दास

कागज को सो पूतरा, सहजहिं में घुल जाय।
‘रहिमन’ यह अचरज लखो, सोऊ खैंचत जाय

रहीम दास

‘रहिमन’ ठठरि धूरि की, रही पवन ते पूरि।
गाँठि जुगति की खुल गई, रही धूरि की धूरि

रहीम दास

‘रहिमन’ वहां न जाइये, जहां कपट को हेत।
हम तो ढारत ढेकुली, सींचत अपनो खेत |

रहीम दास

सब कोऊ सबसों करें, राम जुहार सलाम।
हित अनहित तब जानिये, जा दिन अटके काम |

रहीम दास

खीरा को सिर काटिकै, मलियत लौन लगाय।
‘रहिमन’ करुवे मुखन की, चहिए यही सजाय |

रहीम दास

‘रहिमन’ नीचन संग बसि, लगत कलंक न काहि।
दूध कलारिन हाथ लखि, सब समुझहिं मद ताहि |

रहीम दास

कौन बड़ाई जलधि मिलि, गंग नाम भो धीम।
केहि की प्रभुता नहिं घटी पर-घर गये ‘रहीम’

रहीम दास

खरच बढ्यो उद्यम घट्यो, नृपति निठुर मन कीन।
कहु ‘रहीम’ कैसे जिए, थोरे जल की मीन |

रहीम दास

जैसी जाकी बुद्धि है, तैसी कहै बनाय।
ताको बुरो न मानिये, लेन कहां सूँ जाय

रहीम दास

जिहि अंचल दीपक दुर््यो, हन्यो सो ताही गात।
‘रहिमन’ असमय के परे, मित्र सत्रु ह्वै जात |

रहीम दास

‘रहिमन’ अँसुवा नयन ढरि, जिय दुख प्रकट करेइ।
जाहि निकारो गेह तें, कस न भेद कहि देइ |

रहीम दास

‘रहिमन’ अब वे बिरछ कह, जिनकी छाँह गंभीर।
बागन बिच-बिच देखिअत, सेंहुड़ कुंज करीर

रहीम दास

‘रहिमन’ जिव्हा बावरी, कहिगी सरग पताल।
आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल

रहीम दास

‘रहिमन’ तब लगि ठहरिए, दान, मान, सनमान।
घटत मान देखिय जबहिं, तुरतहि करिय पयान |

रहीम दास

‘रहिमन’ खोटी आदि को, सो परिनाम लखाय।
जैसे दीपक तम भखै, कज्जल वमन कराय |

रहीम दास

आप न काहू काम के, डार पात फल फूल।
औरन को रोकत फिरै, ‘रहिमन’ पेड़ बबूल

रहीम दास

एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय।
‘रहिमन’ मूलहि सींचिबो, फूलहि फलहि अघाय

रहीम दास

कदली,सीप,भुजंग मुख, स्वाति एक गुन तीन।
जैसी संगति बैठिए, तैसोई फल दीन

रहीम दास

अन्तर दावा लगि रहै, धुआं न प्रगटै सोय।
के जिय जाने आपनो, जा सिर बीती होय

रहीम दास

करत निपुनई गुन बिना, ‘रहिमन’ निपुन हजूर।
मानहुं टेरत बिटप चढि, मोहि समान को कूर |

रहीम दास

कमला थिर न ‘रहिम’ कहि, यह जानत सब कोय !
पुरूष पुरातन की वधू, क्यों न चंचला होय |

रहीम दास

कहु ‘रहीम’ कैसे निभै, बेर केर को संग।
वे डोलत रस आपने, उनके फाटत अंग

रहीम दास

कहि ‘रहिम’ संपति सगे, बनत बहुत बहु रीति।
बिपति-कसौटी जे कसे, सोई सांचे मीत

रहीम दास

काह कामरी पामड़ी, जाड़ गए से काज ।
‘रहिमन’ भूख बुताइए, कैस्यो मिले अनाज |

रहीम दास

कहु ‘रहीम’ कैतिक रही, कैतिक गई बिहाय ।
माया ममता मोह परि, अन्त चले पछीताय |

रहीम दास

कोउ ‘रहीम’ जहिं काहुके, द्वार गए पछीताय ।
संपति के सब जात हैं, बिपति सबै ले जाय |

रहीम दास

कैसे निबहै निबल जन, करि सबलन सों बैर ।
‘रहिमन’ बसि सागर विषे, करत मगर सों बैर |

रहीम दास

गरज आपनी आप सों , ‘रहिमन’ कही न जाय ।
जैसे कुल की कुलबधू, पर घर जात लजाय |

रहीम दास

खैर , खुन, खाँसी, खुशी, बैर, प्रीति, मद-पान ।
‘रहिमन’ दाबे ना दबै, जानत सकल जहान |

रहीम दास

जब लगि वित्त न आपुने , तब लगि मित्र न होय ।
‘रहिमन’ अंबुज अंबु बिनु, रवि नाहिंन हित होय

रहीम दास

छिमा बड़ेन को चाहिए , छोटन को उतपात ।
का ‘रहीम’ हरि को घट्यो, जो भृगु मारी लात |

रहीम दास

जैसी परै सो सहि रहे , कहि ‘रहीम’ यह देह ।
धरती ही पर परग है , सीत, घाम औ’ मेह |

रहीम दास

जे ‘रहीम’ बिधि बड़ किए, को कहि दूषन काढ़ि ।
चंद्र दूबरो कूबरो, तऊ नखत तें बाढ़ि |

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